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बैंकों की हालत नहीं सुधरी तो.,,,,,,,
August 27, 2020 • Admin • राष्ट्रीय

     देश के चहुंमुखी विकास का सपना देखने वालों के लिए यह दौर बहुत खतरनाक है। एक ओर हम मेक इंन इंडिया की बात कर रहे हैं तो दूसरी ओर जिस आधार पर हमारा उद्योग जगत टिका हुआ है, वह आधार ही डगमगा रहा है। देश के बैंकों की लगातार गिरती हालत से यदि अभी सावधान नहीं हुए तो विकास की गति मंद ही नहीं, थमने की पूरी आशंका है। 

  • जून में समाप्त हुई तिमाही के परिणाम बहुत चौंकाने वाले हैं। इस दौरान देश में सूचीबद्ध 39 बैंकों में से 19 का लाभ 95 से 81 प्रतिशत के बीच कम हुआ। इनमें 14 सार्वजनिक बैंक हैं। लाभ वृद्धि दर में बढ़ोत्तरी दर्शाने वाले शेष बीस बैंकों में से 11 प्राइवेट हैं। गत वर्ष के मुकाबले निजी बैंकों का लाभ 11.1 प्रतिशत बढ़ गया, जबकि सार्वजनिक बैंकों का लाभ 21 फीसदी गिर गया है। मतलब यह कि सरकारी नियंत्रण वाले जो बैंक लाभ दर्शा रहे हैं, उनकी हालत भी बहुत अच्छी नहीं है।
    अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी के अनुसार चालू वित्त वर्ष में बैंकों को बैड लोन के अभिशाप से मुक्ति नहीं मिलेगी। उलटे यह रकम 4.6 प्रतिशत (मार्च 2015) से बढ़कर 4.8 फीसदी हो जाएगी। बीते साल सार्वजनिक बैंकों का एनपीए तो लक्ष्मण रेखा लांघकर 5.2 प्रतिशत पर पहुंच चुका था, इसमें और इजाफे के आसार हैं। सरकार और वित्त मंत्रालय के आला अधिकारी इस कड़वे सच से वाकिफ हैं। अधिकृत आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष मार्च तक कर्जदारों के पास देश के सभी बैंकों का 30.9 खरब रुपया फंसा पड़ा था, जिसमें अकेले सार्वजनिक बैंकों के 26.7 खरब रुपए हैं। उनका नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) खतरनाक सीमा पर खड़ा है। खस्ताहाल बैंकों में प्राण फूंकने के लिए कुछ समय पहले वित्त मंत्री ने चार साल में सत्तर हजार करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी। पच्चीस हजार करोड़ रुपए की पहली किश्त जारी भी कर दी गई है, फिर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। केवल इस रकम से उनकी धन की तंगी पाटना कठिन है। जरूरत का शेष 1.20 लाख करोड़ रुपया उन्हें बाजार से उगाहना पड़ेगा, जिसके लिए सरकार को अपने शेयर बेचने पड़ेगें।
    बैंक किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं और जब उनकी हालत खस्ता हो, तब अर्थव्यवस्था में सुधार के दावे बेमानी माने जाएंगे। असल में देश के बैंकिंग उद्योग में सार्वजनिक बैंकों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है और उनमें से अधिकांश आज बीमार हैं। आरबीआई इस कड़वे सच को जानता है, इसी कारण सरकार के भारी दबाव की उपेक्षा कर उसने अगस्त में बैंक दर घटाने से इनकार कर दिया। 
    कर्ज की भारी रकम डूब जाने के कारण बैंक अब बहुत फूंक-फूंककर कदम उठा रहे हैं। उनमें ज्यादा जोखिम उठाने की ताकत भी नहीं बची है। गत एक वर्ष में बैंकों द्वारा दिए गए कर्जों में केवल 9.4 फीसदी का इजाफा हुआ है, जो मौजूदा दशक में सबसे कम है। गत वर्ष यह दर 13.2 प्रतिशत थी। यानी समस्त सरकारी दावों के बावजूद सालभर में सुधार के बजाय 3.8 प्रतिशत की गिरावट आई है। यदि मुद्रास्फीति से तुलना कर हिसाब जोड़ें, तो हालात और खराब दिखते हैं। गत वर्ष जून से इस साल जून के बीच मुद्रास्फीति की औसत दर 5.3 प्रतिशत थी। बैंक ऋण की विकास दर से मुद्रास्फीति दर घटाने (9.4 - 5.3 = 4.1) पर ही असली बढ़ोतरी का पता चलता है। इस हिसाब से ऋ ण विकास दर का आंकड़ा और कम हो जाता है। इसी कारण उद्योगों को ऋ ण मिलने में कठिनाई हो रही है।
    बैंकों की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया कर्ज पर मिलने वाला ब्याज (नेट इंटरेस्ट इनकम यानी एनआईआई) होता है। इस मोर्चे पर भी सार्वजनिक बैंक फिलहाल फिसड्डी साबित हुए हैं। जून में एनआईआई में नौ फीसदी इजाफा दर्ज किया गया, जो पिछले 18 साल में सबसे कम है। कुल मिलाकर सरकार को बैंकों की स्थिति सुधारने की दिशा में बहुत जल्द ठोस कदम उठाने होंगे, नहीं तो मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और ऐसी अनेक योजनाएं प्रारंभ होने से पहले ही समाप्त हो जाएंगी। 
    -संजय सक्सेना