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भाजपा-कांग्रेस के सामने सरकार बचाने और बनाने की चुनौती :कृष्ण देव सिंह
June 29, 2020 • Admin

भोपाल।  मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव के सम्पन्न. होते ही अब भाजपा के सामने शिवराज सिंह चौहान सरकार को बचाये रखने तथा कांगे्स के सामने फिर से सरकार बनाने की चुनौती विधानसभा के 24 उपचुनावों में सामने आ गई है। 'हलांकि राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा को अपने स्वयं के संख्या बल से दो मत कम मिलने से उसके प्रबंध कौशल के सामने सवालिया निशान लगा है उससे कांग्रेस के हौंसले कुछ बुलंद हो गए हैं। लेकिन कांग्रेस का भी एक मत निरस्त हुआ है၊ भाजपा ने प्रदेश में प्रस्तावित उपचुनावों की तैयारी काफी पहले आरम्भ कर दी थी तो कांग्रेस भी अन्दर ही अन्दर अपनी जमावट करने में मशगूल है၊ उपचुनावों के नतीजों से ही साफ हो सकेगी कि शिवराज सरकार बनी रहेगी या कमलनाथ पुन: प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। कांग्रेस भले ही आत्मविश्‍वास से लबरेज हो लेकिन उसके सामने भाजपा की तुलना में अनेक दुश्‍वारियां हैं, क्योंकि यदि उसे सरकार में आना है तो कम से कम 18 से 20 स्थानों पर जीत दर्ज कराना होगी, जबकि भाजपा नौ-दस सीटें ही जीत लेती है तो उसकी सरकार बनी रहेगी। यदि कांग्रेस मैदानी जमावट करने के साथ ही उम्मीदवारों का चयन केवल जीतने की क्षमता पर करती है तब कहीं जाकर वह उम्मीद लगा सकती है कि उसकी सरकार बन जाये। भाजपा के सामने उपचुनावों के साथ ही एक और चुनौती मंत्रिमंडल विस्तार की है ၊बहरहाल उपचुनावों में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा कांग्रेस की ओर से दोनों पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ , दिग्विजय सिंह की प्रतिष्ठा प्रमुख रूप से. दाव पर लगी है၊ जहां तक मंत्रिमंडल विस्तार का सवाल है उसमें एक तो दलबदल के पूर्व किए गए वायदे को पूरा करना है तो यह चुनौती भी है कि भाजपा के नेताओं के लिए खाली स्थान कम बचेंगे जबकि दावेदार अनेक हैं၊ चर्चा के अनुसार शिवराज कम से कम तीन-चार अपने खास पसंदीदा लोगों को अपनी टीम में जगह देना चाहते हैं जबकि संगठन का जोर नये चेहरों पर है। ऐसे में ही शिवराज का वह कौशल कसौटी पर होगा जिसमें वे ऐसा संतुलन बिठायें कि क्षेत्रीय व जातिगत असंतुलन भी न हो, कुछ चहेते भी आ जायें और कुछ नये चेहरों को भी जगह मिल जाये ၊चर्चा के अनुसार भाजपा के पूर्व मंत्री गोपीलाल जाटव ने क्रास वोटिंग कर दिग्विजय सिंह को वोट दिया जबकि उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया को वोट देने को कहा गया था। दूसरा वोट जुगल किशोर बागड़ी का निरस्त हुआ है၊ दोनों ही दलित विधायक हैं ၊ संदेश है कि सिंधिया के साथ विधायकों के भाजपा में आने से जाटव जैसे कई विधायक हैं၊ हालांकि वे अब कह रहे हैं कि उन्होंने सिंधिया को ही वोट किया जबकि इसके पूर्व वह गलती होने की बात भी कह चुके हैं। यदि जाटव ने सिंधिया को वोट दिया है तो फिर सिंधिया को आवंटित 57 वोटों के स्थान पर 56 वोट कैसे मिले। इसी प्रकार उसके दूसरे उम्मीदवार सुमेर सिंह सोलंकी को एक मत कम क्यों मिला। जुगल किशोर बागड़ी के बारे में जो सफाई दी गयी कि उनकी उम्र ज्यादा हो गयी है, अस्वस्थ हैं इसलिए निशान लगाने में चूक हो गयी। भाजपा इस बात को लेकर बाग-बाग है कि उसे उसके विधायकों की संख्या से ज्यादा वोट मिले।क्योंकि तीन निर्दलीय और सपा-बसपा के तीन विधायकों ने भाजपा को मत दिया और यदि भाजपा.के वोट बढ़े हैं तो उसका श्रेय गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा को जाता है ၊ जहां तक झटका लगने की जो बात है उसमें एक तो भाजपा प्रबंधन के तमाम दावों के विपरीत कांग्रेस का कोई वोट कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ गया और दूसरे प्रबंध कौशल में माहिर नेताओं के सक्रिय रहने एवं दिल्ली से दो केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, नरेन्द्र सिंह तोमर, उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी विनय . सहस्त्रबुद्धे तथा विजयंत पांडा के यहां डेरा डालने और प्रशिक्षण पर प्रशिक्षण विधायकों को देने के बावजूद उसके दो वोट कम हो गए। यह चूक कैसे हो गयी? कांग्रेस के सामने अधिक बड़ी चुनौती इस मायने में है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जो 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के स्टार प्रचारक थे ,वे अब भाजपा खेमें में हैं। सिंधिया जी-जान से अपने सभी प्रत्याशियों को जिताने के लिए जुटेंगे और दूसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का अपना आभामंडल काम करेगा तो भाजपा के पास इसके अलावा केंद्रीय मंत्री तथा संगठनात्मक जमावट में सिद्धहस्त नरेंद्र सिंह तोमर और भाजपा में नेतृत्व द्वारा सौपे गये दायित्व को सफलतापूर्वक अंजाम देने में निपुण माने जाने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता इसी इलाके के हैं। कांग्रेस के पास पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अतिरिक्त कोई बड़ा चेहरा इस इलाके में नहीं है लेकिन फूलसिंह बरैया के रुप में उसे एक चेहरा मिल गया है जिसकी ग्वालियर-चम्बल संभाग में दलितों में अच्छी पैठ है၊ इसके अलावा डॉ. गोविन्द सिंह, के.पी. सिंह, अशोक सिंह इस इलाके के नेता हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में इनकी पकड़ है। अब बालेन्दु शुक्ला के कांग्रेस में आ जाने से उसे एक बड़ा चेहरा मिल गया है। उपचुनाव एक तरह से जनता पर थोपे हुए ही कहे जाएंगे, लेकिन मजबूरी है। चुनाव तो कराना ही है, अब चाहे उम्मीदवार हों या पार्टी के अन्य नेता, जनता के बीच कैसे जाएंगे, प्रचार कैसे करेंगे, ये सवाल थोड़ा उलझा हुआ है।लगभग डेढ़ साल चली कांग्रेस सरकार अचानक लडख़ड़ा कर गिर पड़ी। बाईस विधायक कांग्रेस छोड़कर पूर्व केंद्रीयमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने सरकार बना लिया ၊अब उन पूरे बाईस पूर्व विधायकों को फिर से जनता के बीच जाना है। परंतु एक मुश्किल तो कोरोना का संक्रमण है। न ज्यादा भीड़ एकत्र कर सकते, न किसी के पास जाकर मिल सकते। । इधर चूंकि पिछला चुनाव कांग्रेस पार्टी के चिन्ह पर लड़े थे, अब भाजपा के चिन्ह पर लड़ रहे हैं। सो जनता के बीच जाएंगे, तो यह मुद्दा भी उनके सामने आएगा। उन्हें विरोध का सामना भी करना पड़ेगा और सवालों के जवाब भी देने होंगे। जनता बहुत ज्यादा सवाल जवाब नहीं करती। ।सो इस हिसाब से इन लोगों को खास दिक्कत आने वाली नहीं है। कुछ मंत्री बन गए हैं, कुछ और बन सकते हैं। सो मंत्री बनने के बाद जब जनता के बीच पहुंचेंगे तो उन्हें फिर से तमाम सपने दिखा देंगे। इस समय प्रदेश में जनता और नेताओं के बीच संवाद नहीं हो रहा, पार्टियों के बीच बयानबाजी अधिक हो रही है। जनता तो दोनों की बयानी जंग चुपचाप देख रही है। बयान भी ऐसे, जो पता ही नहीं चलते कि कमर के ऊपर हैं या ...।राजनेताओं के बयानों में भी मर्यादाओं का कहीं ध्यान नहीं रखा जा रहा है।देखा जाए तो बयानी युद्ध से तो दोनों ही दल फिलहाल निराशा का गहरा भाव ही सामने ला रहे हैं। कुछ मुद्दे हैं। जैसे शराब-रेत के ठेके, तबादला उद्योग, किसान, नौजवान। फिर एक सरकार का गिरना, दूसरे का बनना। किसने किसको धोखा दिया, किसने जनता को धोखा दिया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक वीडियो वायरल हुआ तो इसे लेकर कीचड़ मच गया है। भाजपा ने इस वीडियो को लेकर एक रिपोर्ट दर्ज कराई तो कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री राहुल गांधी के एक वीडियो का मामला लेकर थाने पहुंच गए। बयानबाजी का यह दौर केवल इसलिए क्योंकि चुनाव आने वाले हैं। सत्ता से अपदस्थ हो चुकी कांग्रेस में खोई जमीन पाने की छटपटाहट है। विरोधियों से समर्थन लेकर सत्ता का साकेत सिद्ध कर चुकी भाजपा फिर सक्रिय है। प्रदेश में मानसून दस्तक दे चुका है, लेकिन राजनीतिक तापमान कम नहीं होने का नाम नहीं ले रहा। रंग बदलती राजनीति के दौर में, निष्ठा-प्रतिष्ठा की लड़ाई इस बार इंदौर से शुरू हुई है। लेकिन पूरा प्रदेश इसमें रंग गया है। पूर्व की पंद्रह साल की सरकार, बनाम पूर्व की डेढ़ साल की सरकार, यह मुद्दा दिखाई दे रहा है। कोई किसान को धोखा देने की बात कर रहा है तो कोई बिजली के बिलों में जनता को धोखा देने का मामला उठा रहा है। पुरानी सरकार के निर्णयों को न केवल पलटने की बात चल रही है၊ कई में तो कार्रवाई तक की चेतावनी दी जा रही है। तब भी तबादला उद्योग का मुद्दा उठाया गया, अब भी यही उद्योग फलता-फूलता दिख रहा है। पिछले तीन सालों में इतने तबादले हुए होंगे,जो तीस साल के दौरान भी हो सकता है नहीं हुए हों। सत्ता बदलते ही सबसे पहले अफसरों की जमावट शुरू कर दी जाती है। कांग्रेस डेढ़ साल जमावट करती रही, लेकिन खुद नहीं जम पाई। अब भाजपा उपचुनाव के लिए जमावट करने में जुटी है। जनता देख रही है। कोरोना का संक्रमण भी झेल रही है लेकिन काम भी तो कुछ नहीं हो रहा है। जनता का एक वर्ग ही है, जो राजनीतिज्ञों का लाड़ला है। सत्ता में रहकर भी उसकी जेब भरी जाती है और चुनाव में भी उसे पैसे से लेकर तमाम वस्तुएं बांटी जाती हैं। बाकी तो जैसे धरती पर बिना बुलाए ही आ गए? मध्यप्रदेश विधानसभा के 24 विधानसभा उपचुनावों में एक प्रकार से कमलनाथ , दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया , शिवराज सिंह चौहान की प्रतिष्ठा दांव पर है।कमलनाथ को फिर से अपनी सरकार बनाना है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को जनता की अदालत में सरकार गिराने के औचित्य और खासकर ग्वालियर-चम्बल संभाग में अपना प्रभाव यथावत है यह साबित करना है। इन दोनों की प्रतिष्ठा की लड़ाई में यदि कुछ दांव पर है तो वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार, क्योंकि नतीजों के बाद ही यह तय होगा कि सरकार बनी रहेगी या कमलनाथ फिर मुख्यमंत्री बनेंगे। पन्द्रह साल का सत्ता का वनवास समाप्त होना कांग्रेस का त्रिकोण पर आश्रित था जिनमें कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह थे। इनमें से एक कोण अब भाजपा के पाले में है, तो सवाल यही है कि उस तीसरे कोण की भरपाई कांग्रेस कर पायेगा ? कांग्रेस के सामने दो बड़ी चुनौतियां ये हैं एक तो सर्वे के आधार पर सही उम्मीदवारों का चयन करे और सारे कांग्रेसजन एकजुट होकर चुनावी अभियान में भिड़ें और दूसरा इन सभी क्षेत्रों में अपने संगठनात्मक ढांचे को बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्रों तक चुस्त-दुरुस्त करे। पहली जरुरत है ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने से जो कमजोरी आई है उसका मुकाबला पार्टी ग्वालियर-चम्बल संभाग में कैसे करेगी, उसके दो कोण तो तैयार हैं लेकिन तीसरा कोण वह कैसे मजबूत करेगी। इस मजबूती के लिए उसके पास कोई एकमात्र चेहरा उस अंचल में दिग्विजय सिंह के बाद नहीं है၊ ऐसी स्थिति में विभिन्न जातियों व समूहों को अपने साथ जोड़ने के लिए कुछ कद्दावर और प्रदेश स्तर के नेताओं का एकसाथ इन क्षेत्रों में उपयोग करे। इन क्षेत्रों के जातिगत समीकरणों को देखते हुए पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष .कांतिलाल भूरिया और अरुण यादव यदि एकजुट होकर सक्रिय होते हैं तो फिर कांग्रेस को अपनी सरकार बनने के प्रति कुछ उम्मीद रखना चाहिये। इसके लिए यह भी जरुरी है कि इनके हाथ मिलने के साथ ही दिल भी आपस में मिलें। ग्वालियर-चम्बल संभाग में राजपूत, ब्राह्मण और गुजर, कुर्मी ,यादव, कुशवाहा मतदाताओं का भी अच्छा-खासा असर है और ये चेहरे मिलकर कांग्रेस के लिए वह तीसरा कोण बन सकते हैं ၊ दलित मतदाताओं को भी ग्वालियर-चम्बल संभाग में साधना होगा, इसके लिए फिलहाल जाटव मतदाताओं में कांग्रेस का स्थानीय चेहरा बनकर फूलसिंह बरैया काफी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। कांग्रेस को इन बड़े चेहरों के साथ इस अंचल में बेहतर प्रदर्शन करना है तो क्षेत्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत प्रभावशाली नेताओं डॉ. गोविंद सिंह, के.पी.सिंह, बालेन्दु शुक्ला, अशोक सिंह को भी एकजुट करना होगा। कांग्रेस की सरकार फिर बन पायेगी या नहीं उसका दारोमदार खासकर ग्वालियर-चम्बल संभाग के नतीजों पर ही निर्भर करेगा, क्योंकि उसके सामने बदले हुए राजनीतिक परिवेश में सबसे बड़ी चुनौती ज्योतिरादित्य सिंधिया, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, गृह एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा और प्रभात झा के साथ ही भाजपा के मजबूत संगठन और संघ की अनुषांगिक संगठनोंं के समर्पित कार्यकर्ताओं से मिलेगी। भाजपा में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, इसका पहला अंदाजा राज्यसभा चुनाव में अपने कोटे के दो मत कम मिलने से हो गया है और दोनों ही विधायक भले ही अलग-अलग इलाकों के हों, लेकिन दलित वर्ग से आते हैं। इनका असंतोष विशेष अर्थ रखता है कि दलित मतदाता 16 क्षेत्रों में काफी प्रभावशाली हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में दलित मतदाताओं ने बड़े पैमाने पर बसपा और भाजपा के स्थान पर कांग्रेस को वोट दिए थे၊।iकुछ चेहरे ऐसे हैं जिनका असंतोष सतह पर आ गया है तो जो अंदर ही अंदर जो अनमने हैं ၊अपेक्स बैंक के पूर्व अध्यक्ष भंवर सिंह शेखावत की नाराजगी खुलकर सामने आ गयी है तो पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे दीपक जोशी कभी नाराज हो जाते है, तो कभी खुश हो जाते हैं, इसलिए आगे चलकर उनकी क्या भूमिका रहेगी यह भी देखने वाली बात होगी। भाजपा ने फिलहाल तय कर लिया है कि दल बदल कर आये सभी 22 पूर्व विधायकों को वह चुनाव मैदान में उतारेगी। इसे भाजपा के पुराने कार्यकर्ता किस सीमा तक पचा पायेंगे इस पर भी चुनाव परिणाम बहुत कुछ निर्भर करेंगे। चूंकि भाजपा उपचुनावों को लेकर किसी भी प्रकार की गफलत नहीं करना चाहती इसलिए नये भाजपाइयों को संघ और पार्टी की विचारधारा के साथ समाहित करने के लिए ऐसा फार्मूला तलाश कर रही है ताकि वह नये-नवेले लोगों को पार्टी की मूल विचारधारा को समझा पाये और उस पर चलना आरम्भ करने के लिए उनको तैयार करे। उपचुनावों में कांग्रेस की एक रणनीति पार्टी छोड़कर भाजपा के टिकट पर लड़ने वाले अपने विद्रोहियों को आइना दिखाने की है, इसलिए वह उनके पुराने बयानों और बातों को ताजा कराने की हरसंभव कोशिश करेगी। इस लड़ाई को जनता बनाम दलबदलू में परिवर्तित करने के मकसद से ही “जनता देगी अपना जवाब“ नारा कांग्रेस ने उछाल दिया है। भाजपा की रणनीति अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ ही 15 माह की कमलनाथ सरकार पर आरोपों की घटाटोप बौछार करते हुए अपनी अभी बनी सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की उपलब्धियां उससे बेहतर बताने की कोशिश करेगी तो 15 साल के कार्यकाल में उसने जो सुशासन दिया उसे आधार बनाकर कांग्रेस को आइना दिखायेगी। कांग्रेस और भाजपा दोनों भलीभांति जानते हैं कि 24 विधानसभा उपचुनावों में हर क्षेत्र में अलग-अलग मुद्दे हावी रहेंगे और इसीलिए भाजपा हर क्षेत्र में अलग-अलग संकल्प-पत्र लेकर मैदान में उतरेगी तो कांग्रेस ने भी इन क्षेत्रों के लिए 24 पुस्तिकाएं तैयार कर ली हैं जिसमें वहां की स्थानीय परिस्थितियों, जातिगत समीकरणों। इस प्रकार 24 संकल्प-पत्रों और 24 पुस्तिकाओं को दोनों ही दल अपनी -अपनी जीत की कुंजी मानकर चलेंगे?

 

साभार:  बुधवार बहुमाध्यम प्रेस