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भोपाली समूह को दिल्ली सहित बनारस महापौर ने किया आमंत्रित
March 3, 2020 • Vijay sharma
गोकाष्ठ से इस बार पांच हजार से अधिक स्थानों पर होगा होलिका दहन
भोपाल। राजधानी में गोकाष्ष्ठ यानी गाय के गोबर की लकड़ी से पांच हजार होलिकाओं का दहन होगा। राजधानी का एक समूह पिछले 16 महीने से इस काम में लगा हुआ है। समूह के प्रयास से केवल भोपाल शहर में ही नौ हजार दाह संस्कार गोकाष्ठ से किए जा चुके हैं, जिससे 50 एकड़ की हरियाली बचाए जाने का अनुमान है। प्रदेश के कई जिलों में भी इस गोकाष्ठ का उपयोग बढ़ाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। जागरूकता की इस ज्योति से दूसरे प्रदेश भी रोशन होना चाहते हैं। भोपाल के इस समूह को दिल्ली महानगर पालिक निगम ने आमंत्रित किया है। वे इस गोकाष्ठ से यमुना और आसपास के इलाके को प्रदूषणमुक्त करना चाहते हैं। बनारस के महापौर ने भी बुलवाया है, ताकि गंगा किनारे के विश्रामघाट में भी गोकाष्ठ के माध्यम से दाह संस्कार हो सके। गोकाष्ठ संवर्द्धन एवं पर्यावरण संरक्षण समिति के कुछ प्रकृति प्रेमी और वैज्ञानिक इस प्रयास को परिणाम में बदलने में लगे हैं।
वैज्ञानिक चाहते हैं बढ़ गोकाष्ठ-
डॉ. योगेंद्र कुमार सक्सेना केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। दो साल पहले उनके पिताजी की मृत्यु हुई, उन्होंने उनका लकड़ी से दाह संस्कार किया। यहीं से उन्हें प्रेरणा मिली कि क्यों न दाह संस्कार के लिए गाय के गोबर से बनी लकडिय़ों का उपयोग किया जाए। इससे हरे-भरे पेड़ भी बचेंगे और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा। इसके बाद भोपाल के श्मशान घाट में संपर्क किया। उन्हें विश्रामघाट समिति से जुड़े समाजसेवी अरुण चौधरी, प्रमोद चुघ, हेमंत अजमेरा सहित कुछ लोग मिले। यहीं से गोकाष्ठ का सफर शुरू हुआ। सभी ने दस-दस हजार रुपये का चंदा किया और नजदीक स्थित रामकली गोशाला में गोकाष्ठ की मशीन लगा दी। प्रयोग इस तरह सफल रहा कि पिछले साल ही इस गोशाला को विश्रामघाट समिति ने 27 लाख रुपये दिए।
प्रशासन ने बढ़ाया उत्साह-
समिति ने पिछले साल तत्कालीन कलेक्टर डॉ. सुदाम खाड़े से आग्रह किया कि जहां-जहां वन विभाग ट्रक खड़े कर होलिका दहन के लिए लकड़ी बेचता है, वहां गोकाष्ठ बेचने की अनुमति दी जाए। इसके बाद खाड़े ने भोपाल के 18 सेंटर पर गोकाष्ठ के स्टॉल लगवा दिए। लकड़ी धरी रह गई और गाय के गोबर की लकड़ी बिक गई। पिछले साल तीन हजार से अधिक होलिका गोकाष्ठ से जलाई गई।
प्रत्येक दाह संस्कार में होती एक पेड़ की बलि-
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सक्सेना कहते हैं कि एक दाह संस्कार के लिए चार से पांच क्विंटल लकड़ी लगती है, जिसके लिए एक हरे भरे पेड़ की बलि दी जाती है पर गोकाष्ठ में मात्र ढाई क्विंटल में ही दाह संस्कार हो जाता है। गोकाष्ठ की कैलोरिक वैल्यू भी लकड़ी की तुलना में ज्यादा होती है और सस्ती भी पड़ती है।
इनका कहना है-
भोपाल में विद्युत शवदाह फेल हो गए, लेकिन गोकाष्ठ से अब तक नौ हजार दाह संस्कार हो चुके हैं। इससे कम से कम पचास एकड़ का जंगल बच गया।
अरुण चौधरी, अध्यक्ष, गोकाष्ठ संवर्द्धन एवं पर्यावरण संरक्षण समिति, भोपाल