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बिहार विधानसभा. के साथ -साथ भाजपा  के  लिए ६६  उपचुनाव  भी  बेहद   अहम         
September 21, 2020 • Admin • राष्ट्रीय

  नई दिल्ली । भाजपा के लिए बिहार विधानसभा चुनाव के साथ-साथ होने वाले एक लोकसभा और विभिन्न. राज्यों की .कुल६५ विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव. भी वेहद महत्वपूर्ण है। उसकी मध्य . प्रदेश की सस्कार का भविष्य. तो इन उपचुनाव ही टिका  हुआ है।   बिहार में जब राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव लाठी में तेल पिला रहे. थे तब जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने कलम में स्याही भर के  लालू का उस साम्राज्य को तोड़ दिए जिसके बारे में उस समय के तमाम राजनीतिक विश्लेषक बड़ी उच्ची आवाजो में बोला करते थे कि लालू अब ज्योति बसु हो गए ၊जब तक इनकी हड्डियों में जान है तब तक इन्हें कोई हिला नही पाएगा? मगर समय बदला कलम में स्याही और गालों में लाली की बाते लोगो को अच्छी लगने लगी और अंतः बिहार में सत्ता परिवर्तन हो गया ၊
    नीतीश कुमार यह भलीभांति जानते थे कि लाठी वाले उनको सत्ता से कभी बेदखल कर ही नही सकते है क्योंकि वे तो सत्ता में आये ही है स्याही और लाली दिखा कर और हकीकत  भी यही है बिहार की राजनीति में लाठी परिवार ( लालू परिवार ) जब तक नीतीश कुमार के सामने रहेगा तब तक नीतीश आधी लड़ाई पहले से ही जीते हुए नजर आते रहेंगे तथा बाद कि आधी लड़ाई चेहरा सहानुभूति आदि के नाम पर लड़ कर जीत हासिल करते रहेंगे ?तो क्या अब नीतीश जी को पराजित करना बिहार की राजनीति में अबूझ पहेली बनती जा रही है ?  मगर  भले नीतीश को लाठी कभी हरा ना पाये लेकिन नीतीश को हराएगा तो उनका कलम ही क्योंकि वे बाते तो कलम में स्याही भरने की कर चुके है और उनकी बातों में आ कर बिहार के युवा स्याही भर कर इंतजार भी कर रहे है।नीतीश जी स्याही तो भर लिए कलम में लेकिन लिखेंगे कहा ? 
        हाल में चुनाव आयोग द्वारा सभी लंबित उपचुनाव कराए जाने की बात कहे जाने पर इन राज्यों में भी राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है। सबसे ज्यादा राजनीतिक गहमागहमी भाजपा में है, क्योंकि कोरोना काल में उसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले यह उपचुनाव एक राजनीतिक परीक्षण भी है कि जनता का मूड इन परिस्थितियों में किस तरह का है। वहीं विपक्ष भी इन हालात में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश करेगा।
     सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मध्य प्रदेश है, जहां 2८विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होना है। इनमें 22 सीटें वे हैं जो कांग्रेस के 22 विधायकों द्वारा एक साथ इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने के कारण रिक्त हुई थीं। इसके फलस्वरूप राज्य में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार का पतन हो गया था और भाजपा की शिवराज सिंह सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ था। इसके अलावा छः और सीटों के उपचुनाव भी लंबित हैं। इनमें तीन क्षेत्रों. के उपचुनाव मौजूदा विधायकों के निधन के कारण होने हैं, जबकि तीन क्षेत्रों में। कांग्रेस के विधायकों के भाजपा की सरकार बनने के बाद इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने के कारण खाली हुई है।
          मध्य प्रदेश के विधानसभा के आंकड़ों के अनुसार 230 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 116 पर होता है। अभी जबकि 2८ सीटें खाली हैं, तब 20२ के प्रभावी सदन में भाजपा 107 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत में है। कांग्रेस के 89 विधायक हैं। बसपा के दो, सपा के एक और निर्दलीय चार विधायक सदन में है। उपचुनाव के बाद जब सदन की प्रभावी संख्या फिर से 230 की हो जाएगी၊ तब बहुमत का आंकड़ा फिर से 116 पर आ जाएगा। इसके लिए भाजपा को 2८ में से नौ सीटें जीतना जरूरी है, जबकि कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत हासिल करने के लिए सभी२७ सीटों को जीतना जरूरी है। अगर भाजपा नौ सीट नहीं जीत पाती है तो उसे सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों की मदद लेनी पड़ सकती है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी कम से कम 20 सीट जीतना चाहेगी, ताकि वह सपा, बसपा और निर्दलीयों की मदद से फिर से सत्ता में आ सके।
       जिन अन्य राज्यों में विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं, उनमें उत्तर प्रदेश और गुजरात की आठ-आठ सीटें, मणिपुर की पांच सीटें, असम, झारखंड, केरल, नगालैंड, तमिलनाडु और उड़ीसा की दो-दो सीटें, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल की एक- एक सीट शामिल है। इसके साथ ही बाल्मीकि नगर लोकसभा सीट का उपचुनाव भी होना है। भाजपा के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के उपचुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनसे कोरोना काल में जनता के मूड की एक झलक मिल सकती है।
    जहाँ तक बिहार विद्यान सभा का चुनाव का प्रश्न है  राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमों लालू प्रसाद किस्मत के धनी हैं। अपनी सूझबूझ और राजनीतिक कौशल से जेल में रहते हुए भी बिहार की राजनीति में अपना दबदबा बनाये हुए हैं। विधानसभा चुनाव में टिकट और वोटों के लिये न सिर्फ उनके दल के नेता बल्कि  कांग्रेस समेत महागठबंधन में शामिल अन्य दलों के दिग्गज भी उनके रांची दरबार में हाज़री बजाते दिख जाते हैं। चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने के बाद भी लालू की राजनीतिक हैसियत और दबदबे में बहुत ज्यादा फर्क नहीं दिखता। जेल में बंद लालू आज भी बिहार में एनडीए सरकार के लिए सबसे बड़े प्रतिद्वंदी बने हुए हैं। या यह कहा जाये कि राजनीति की एक धुरी बने हुए हैं?
           करीब 15 वर्षों तक  बिहार में सरकार चलाने के बाद भी एनडीए की राजनीति का बड़ा  हिस्सा लालू व लालू परिवार के विरोध पर ही टिकी है। यह भी एक संयोग ही है कि एनडीए और लालू दोनों डेढ़ -डेढ़ दशक तक बिहार में शासन कर चुके हैं। पहला डेढ़ दशक लालू प्रसाद -राबड़ी देवी का था। दूसरा डेढ़ दशक एनडीए का है। सत्ता के खेल में लालू को को परास्त कर सरकार बनाने में एनडीए जरूर सफल रहा लेकिन लालू के राजनीतिक आभामंडल को समाप्त करने में  वह पुरी तरह कामयाव नहीं रहा है। 15 वर्षों तक सरकार चलाने के बाद भी एनडीए के नेता अपने शासन की तुलना लालू काल से ही करते हैं। और यही तुलना लालू के लिए संजीवनी का काम करती है। हालांकि यह भी सच है कि एनडीए ने खासकर भारतीय जनता पार्टी ने उनके जनाधार में जोरदार सेंधमारी की है। लालू करीब -करीब हाशिये पर पहुंच चुके थे, लेकिन एनडीए में टूट ने लालू प्रसाद को एक नया राजनीतिक जीवन दे दिया और इसका भरपूर लाभ उठाते हुए उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को राजनीति में लांच कर दिया। यह अलग बात है की वे लालू की तरह आम आदमी से खुद को कनेक्ट नहीं कर पा रहे है जिसका भरपुर राजनीतिक लाभ मुख्यमत्री नीतीश कुमार को मिल रहा है।वैसे बेशक लालू यादव रांची जेल में सजा काट रहे हैं। लेकिन यह कैसा जेल और कैसी सजा है? पहले उन्हें जेल से रिम्स के पेइंग वार्ड में रखा गया। फिर कोरोना से बचाने के नाम पर उन्हें रिम्स के डायरेक्टर का बंगला आवंटित कर दिया गया। वहां  सारी सुविधाएं मौजूद हैं।  मिलने -जुलने की पूरी आजादी है। वह लालू का चुनावी कार्यालय बन गया है। टिकट चाहनेवालों की भीड़ रहती है। लोग तोहफे लेकर पहुँच रहे हैं।  मीडिया में ये ख़बरें आने के बाद वहां मजिस्ट्रेट जरूर तैनात किये गए हैं। लेकिन मजिस्ट्रेट किसका आदेश मानेंगे, यह सबको पता है। लालू की पार्टी हेमंत सोरेन सरकार में शामिल है ।ताजा घटनाक्रम में लालू के प्रति सीबीआई से लेकर एनडीए तक रुख बदला -बदला सा दिख रहा है। एक समय था जब जेल मैन्युअल के उल्लंघन का हवाला देते हुए सीबीआई से लेकर बीजेपी और जेडीयू के नेता कोर्ट तक पहुँच जाया करते थे। लेकिन अब इन्हें जेल मैन्युअल का उल्लंघन नजर नहीं आता? सब कुछ बदला -बदला सा नजर आ रहा है।तो क्या यह किसी नयी राजनीति की पटकथा लिखी जाने का संकेत है ?
*समाप्त