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कृर्षि विधेयक : निहत्थे लोकतंत्र को चक़्व्यूह में फंसाकर वघ किया गया?
September 23, 2020 • के.डी. सिंह • मध्यप्रदेश

              पटना । कमजोर और निहत्थे लोकतंत्र को चक्रव्यूह में फंसाकर, उसके वध को सम्भव बनाने वाले  मे एक जाने माने  पत्रकार भी हैं। यह पत्रकारों की उस लम्बी श्रृंखला की जीवंत सक्सेस स्टोरी हैं, जो चारण लेखन कर राज्यसभा से नवाजे जाते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया और प्रभात खबर जैसे अखबारों से जुड़े पत्रकार हरिवंश नारायण सिंह, काफी जूनियर होने के बावजूद राज्यसभा के उपभापति की आसंदी तक पहुँच गए। उस कृपा का बदला उन्होंने लोकतंत्र के खून से चुका दिया। हंगामे और विरोध के बीच किसान गुलामी बिल को ध्वनि मत से पारित हो गया ၊राज्यसभा का जब इतिहास लिखा जाएगा, तो उच्च सदन के निम्नतम बिन्दुओ में वह क्षण शामिल किया जाएगा, जिस क्षण हरिवंश नारायण सिंह उसकी ऊंची कुर्सी पर विराजमान थे। 
         क्या है कृषि विधेयक?
1. पहला बिल- त्अब किसानों की उपज सिर्फ सरकारी मंडियों में ही नहीं बिकेगी, उसे बड़े व्यापारी भी खरीद सकेंगे। 
          मेरी समझ में नहीं आती कि आखिर ऐसा कब था कि किसानों की फसल को व्यापारी नहीं खरीद सकते थे?बिहार में तो अभी भी बमुश्किल ९से १० फीसदी फसल ही सरकारी मंडियों में बिकती है। बाकी व्यापारी ही खरीदते हैं।क्या फसल की खुली खरीद से किसानों को उचित कीमत मिलेगी? यह भ्रम है। क्योंकि बिहार में मक्का जैसी फसल सरकारी मंडियों में नहीं बिकती, इस साल किसानों को अपना मक्का ९सौ से ११ सौ रुपये क्विंटल की दर से बेचना पड़ा। जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य १८५०रुपये प्रति क्विंटल था।
    ठीक है। हर कोई किसान की फसल खरीद सकता है, राज्य के बाहर ले जा सकता है। आप ऐसा किसानों के हित में कर रहे हैं। कर लीजिये। मगर एक शर्त जोड़ दीजिये, कोई भी व्यापारी किसानों की फसल सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत में नहीं खरीद सकेगा। क्या सरकार ऐसा करेगी?
2. दूसरा बिल- अनुवन्ध की किसानी। इसपर उतनी चर्चा नहीं हो रही है। इसमें कोई भी उद्योग घराना किसानों से अनुवंघ करके खेती कर पायेगा। यह वैसा ही होगा जैसा आजादी से पहले यूरोपियन प्लांटर बिहार और बंगाल के इलाके में करते थे। मतलब यह कि कोई कार्पोरेट आयेगा और  जमीन लीज पर लेकर खेती करने लगेगा। इससे मेरा थोड़ा फायदा हो सकता है। मगर मेरे गाँव के उन गरीब किसानों का सीधा नुकसान होगा जो आज छोटी पूंजी लगाकर मेरे जैसे नॉन रेसिडेन्सियल किसानों की जमीन लीज पर लेते हैं और खेती करते हैं। ऐसे लोगों में ज्यादातर भूमिहीन होते हैं और दलित, अति पिछड़ी जाति के होते हैं। वे एक झटके में बेरोजगार हो जायेंगे। 
कार्पोरेट के खेती में उतरने से खेती बड़ी पूंजी, बड़ी मशीन के धन्धे में बदल जायेगी। मजदूरों की जरूरत कम हो जायेगी। गाँव में जो भूमिहीन होगा या सीमान्त किसान होगा, वह बदहाल हो जायेगा। उसके पास पलायन करने के सिवा कोई रास्ता नहीं होगा। 
3. तीसरा बिल- एसेंशियल कमोडिटी बिल।
    इसमें सरकार अब यह बदलाव लाने जा रही है कि किसी भी अनाज को आवश्यक उत्पाद नहीं माना जायेगा। जमाखोरी अब गैर कानूनी नहीं रहेगी। मतलब कारोबारी अपने हिसाब से खाद्यान्न और दूसरे उत्पादों का भंडार कर सकेंगे और दाम अधिक होने पर उसे बेच सकेंगे। हमने देखा है कि हर साल इसी वजह से दाल, आलू और प्याज की कीमतें अनियंत्रित  होती हैं। अब यह सामान्य बात हो जायेगी।
   कुल मिलाकर ये तीनों बिल बड़े कारोबरियों के हित में हैं और खेती के वर्जित क्षेत्र में उन्होने उतरने के लिए मददगार साबित होंगे। अब किसानों को इस क्षेत्र से खदेड़ने की तैयारी है। क्योंकि इस डूबती अर्थव्यवस्था में खेती ही एकमात्र ऐसा सेक्टर है जो लाभ में है।  यह बिल लागू हो जाता है तो किसानी के पेशे से छोटे और मझोले किसानों और खेतिहर मजदूरों की विदाई तय मानिये। मगर ये लोग फिर करेंगे क्या? क्या  इतने लोगों के वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था है? 
              हरिवंश जी ! हंगामे से हैं आहत
     राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश  20 सितंबर को कृषि विधेयकों के पारित होने के दौरान विपक्षी सांसदों की ओर से किए गए हंगामे के खिलाफ 2 ४घंटों के लिए उपवास रखेंगे। उप सभापति हरिवंश ने राज्यसभा के सभापति को लिखे पत्र में कहा, ‘राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उससे पिछले दो दिनों से गहरी आत्मपीड़ा, तनाव और मानसिक वेदना में हूँ। मैं पूरी रात सो नहीं पाया।’
    सभापति को लिखे पत्र में उप सभापति हरिवंश ने कहा, ‘सदन के सदस्यों की ओर से लोकतंत्र के नाम पर हिंसक व्यवहार हुआ। आसन पर बैठे व्यक्ति को भयभीत करने की कोशिश हुई। उच्च सदन की हर मर्यादा और व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई गईं। सदन में सदस्यों ने नियम पुस्तिका फाड़ी। मेरे ऊपर फेंका।’सदन में दस्तावेजों को पलटने, फेंकने और फाड़ने की घटनाएं हुईं’၊उप सभापति हरिवंश ने कहा, ‘सदन के जिस ऐतिहासिक टेबल पर बैठकर सदन के अधिकारी, सदन की महान परंपराओं को शुरू से आगे बढ़ाने में मूक नायक की भूमिका अदा करते रहे हैं, उनकी टेबल पर चढ़कर सदन के जरूरी कागजात-दस्तावेजों को पलटने, फेंकने और फाड़ने की घटनाएं हुईं।’
          चाय पिलाने पहुंचे हरिवंश जी
राज्‍यसभा से निलंबित आठों सांसद रातभर गांधी प्रतिमा के सामने धरने पर बैठे रहे। उन्‍हें सभापति वेंकैया नायडू ने रविवार को सदन में हंगामा करने और उपसभापति से बदसलूकी के लिए सस्‍पेंड किया था। सोमवार दोपहर से धरना दे रहे सांसदों से मिलने मंगलवार सुबह खुद डिप्‍टी चेयरमैन हरिवंश वहां पहुंच गए। वह अपने साथ एक झोला लाए थे जिसमें सांसदों के लिए चाय थी। हरिवंश ने अपने हाथों से चाय निकाली। हालांकि विपक्षी सांसदों ने चाय पीने से इनकार कर दिया। उन्‍होंने उन सांसदों से बेहद गर्मजोशी से बात की၊
               मोदी ने की प्रशंसा
    संसद परिसर में निलंबन के विरोध में प्रदर्शन कर रहे सांसदों को चाय पिलाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश जी के उदार हृदय और विनम्रता की ट्वीट कर प्रशंसा की। पीएम मोदी ने ट्वीट में लिखा, ‘बिहार की धरती ने सदियों पहले पूरे विश्व को लोकतंत्र की शिक्षा दी थी। आज उसी बिहार की धरती से प्रजातंत्र के प्रतिनिधि बने हरिवंश जी ने जो किया, वह प्रत्येक लोकतंत्र प्रेमी को प्रेरित और आनंदित करने वाला है।’ पीएम ने अगले ट्वीट में लिखा, ‘यह हरिवंश जी की उदारता और महानता को दर्शाता है। लोकतंत्र के लिए इससे खूबसूरत संदेश और क्या हो सकता है। मैं उन्हें इसके लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।’
        कांग्रेस - भाजपा में फर्क
     किसान को नासमझ कहने वालो को नहीं मालूम कि आज भी ९0% बौद्धिक प्रतिभा किसान के घर में ही जन्म लेती है। और हां,  खेती-किसानी जन्मजात निजी उद्द्यम ही है। इसकी सबसे ज्यादा दुर्गति उन्ही लोगों ने की जिन्होंने किसान हित की ज्यादा मगर झूठी, अप्रासंगिक बात की।
           20११में लोकपाल बिल राज्यसभा में पेश हुआ था, सरकार जरूरी आंकड़े नहीं जुटा पाई। देर रात तक बहस होती रही और मामला जब फंसने लगा तो आरजेडी सांसद राजनीति प्रसाद ने केंद्रीय मंत्री नारायण सामी के हाथ से बिल की प्रति फाड़ दी, इससे वोटिंग टल गई।आज मिनट भर के अंदर विपक्षी सदस्यों के मत विभाजन की मांग को खारिज करते हुए उपसभापति हरिवंश ने ध्वनि मत से बिल पास कर दिया, ये ना केवल संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है, बल्कि इस देश के हर मतदाता के वोट देने के अधिकार का भी अपमान है। 
        हितैषी होने का दावा हास्यास्पद
      मैं मूलतः कृषक परिवार का सदस्य हूँ၊ मुक्षे लगता है कि यह.कृषि विधेयक को किसानों के लिए विनाशकारी है।मोदी सरकार अगर सचमुच किसानों की हितैषी हैं तो पूरे देश में धान और गेहूं का समर्थन मूल्य 2 ५सौ रुपए घोषित करे। गेहूं का समर्थन मूल्य मात्र ५० रुपए बढ़ाने से स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की अनदेखी नहीं हो रही हैं၊ पिछले ६साल से केंद्र में भाजपा सत्तारूढ़ है। मोदी सरकार ने ६साल तक स्वामीनाथन रिपोर्ट क्यों दबाए रखा?  छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने आयोग और किसान हित को ध्यान में रखकर 2५सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदा, जिसका मोदी सरकार ने खुला असहयोग किया?किसानों के हितैषी बनने का दावा कर रही मोदी सरकार ने रबी की उपज के समर्थन मूल्य में मात्र 3 से ५.प्रतिशत की बढ़ोतरी की है जो किसानों के लिए ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर है। किसान हित में  स्वामीनाथन आयोग की दुहाई देना हास्यास्पद है।  प्रधानमंत्री  समेत केंद्रीय मंत्री और भाजपा सरकार देश को बताएं कि कृषि विधेयक से आखिर किसानों को क्या फायदा होगा? वास्तविकता ये है कि देश के किसान समझ चुके हैं कि कृषि विधेयक कार्पोरेट घराने को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है।इस विधेयक के माध्यम से किसानों के साथ छल कर रही है। कोरोना संकट काल में अचानक लॉकडाउन से लाखों असंगठित मजदूरों, छोटे उद्योगों, छोटे व्यवसाइयों को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। कई लोगों की अकाल मौत हो गई। लोगों के सामने जबर्दस्त आर्थिक संकट है। लोगों को राहत देने केंद्र सरकार ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की, लेकिन देश की जनता को पैकेज का लाभ नहीं मिला है। 20 लाख करोड़ का पैकेज किसकी भेंट चढ़ चुका है।20१४के चुनाव में भाजपा ने 2 करोड़ लोगों को हर साल रोजगार देने, महंगाई कम करने, किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था।  किसानों की आय दोगुनी करना तो दूर देश के अधिकांश राज्यों में किसानों की हालत बदतर है၊भाजपा नेताओं ने नोटबंदी के फायदे गिनाए थे, लेकिन नोटबंदी के बाद बेरोजगारी बढ़ी और व्यवसाय चौपट हो गए। जीएसटी लागू करते समय एक देश एक टैक्स की बात कहते हुए महंगाई कम होने का दावा किया गया जो पूरी तरह फ्लाप साबित हुआ। अब कृषि विधेयक के फायदे बताए जा रहे हैं। Iतो क्या यह विधेयक भी किसानों के लिए छलावा साबित नहीं होगा?
* समाप्त.