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लव आजकल फि़ल्म समीक्षा
February 17, 2020 • Vijay sharma
समीक्षक : रोमेंस चौबे
भोपाल। इम्तियाज़ इसी नाम से 2009 में फि़ल्म बना चुके हैं और 11 साल बाद वैसे ही विषय पर,बिना नाम बदले फि़ल्म ले कर आते हैं तो ये बात तो तय थी की फि़ल्म की कहानी,प्रस्तुति काफ़ी कुछ पिछली फि़ल्म जैसी ही होगी।पर चूँकि पिछली फि़ल्म मनोरंजक थी और इस बार प्रेम कहानी में,कार्तिक और सारा हैं,जो कि युवा दिलों की नयी धड़कन हैं,तो अपेक्षाएँ थोड़ी ज़्यादा ही थीं। तो क्या 2020 की लव आजकल इन अपेक्षाओं पर खरी उतरी?
दो शब्दों में इसका जवाब है-बिलकुल नहीं
आइए पता करते हैं ऐसा क्यूँ हुआ?
  फि़ल्म की कहानी पुरानी लव आजकल की थीम पर ही है। वर्तमान समय में कार्तिक सारा को पसंद करते हैं और इसके लिए उनका पीछा करते हैं।सारा अपने कैरियर पर ध्यान दे रही हैं तो इस समय जीवन में कोई गंभीर रियते नहीं चाहती। कहानी 90 के क्यूएसक्यूटी वाले समय से जुड़ती है,तब भी कार्तिक अपना सब कुछ छोड़ कर आरुषि को पाना चाहते हैं।दोनो प्रेम कहानियाँ,एक दूसरे को प्रभावित कर,कैसे अपने अंजाम तक पहुँचती हैं यही मूल विषय है। फि़ल्म की कहानी में समस्या यह है की इसमें कोई बड़ा व्यवधान स्थापित ही नहीं किया गया है। किरदार ख़ुद की ही मानसिकता/ सोच के कारण, अपनी प्रेम कहानी में समस्याएँ उत्पन्न करते हैं।हर बार ऐसा होने पर दर्शक कहानी से कटाव महसूस करने लगता है। साथ ही,90 के दशक की कहानी को जिस प्रकार गैर-भावनात्मक ढंग से,अपने अंजाम तक इम्तियाज़ ने पहुँचाया है,वो सच में प्रेम कहानी की आत्मा को ही मार देता है। फि़ल्म की पटकथा भी उलझी हुई है।असल में फि़ल्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष था की कैसे दोनों कहानियाँ आपस में रोमांचक तरीक़े से जुड़ती हैं पर इम्तियाज़ की पटकथा,ऐसा करते में फि़ल्म की गति को पूरी तरह ख़त्म कर देती है । इम्तियाज़ का निर्देशन भी निराश करता है।उन्होंने निर्देशन का एक प्रयोगात्मक तरीक़ा ढूँढा है जिसमें कहानी की मुख्य बातों को बहुत गति से या सांकेतिक रूप से दिखा दिया जाता है,किरदारों को दार्शनिक संवाद दिए जाते हैं, बातचीत के द्र्श्य लम्बे होते हैं और उनमें बेक ग्राउंड म्यूजिक बहुत कम होता है।ये शैली तब तो सफल है अगर दर्शक कहानी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाए जैसे रॉकस्टार में हुआ क्यूँकि फि़ल्म एक यात्रा करती हुई आगे बढ़ रही थी, पर तमाशा,जब हैरी मेट सजल और अब लव आजकल में ये जुड़ाव स्थापित नहीं हो पाता क्यूँकि फि़ल्म अनेक अवसरों पर दिशाहीन हो जाती है। अभिनय के हिसाब से कार्तिक ठीक हैं पर इम्तियाज़ ने उन्हें एक ही(खोया हुआ,शर्मिला,सकुचाया) एक्सप्रीशन के साथ बांध दिया है,जिस कारण एक समय के बाद उनका अभिनय मोनोटोनस हो गया।सारा सामान्य द्र्श्यों में स्वाभाविक हैं पर भावनात्मक दृश्यों में वो ओवर एक्टिंग का शिकार हुई हैं।आरुषि का अभिनय सधा हुआ,आकर्षक है। रणदीप हूडा बहुत बढिय़ा हैं। प्रेम कहानी होने के बाद भी प्रीतम का संगीत साधारण है जबकि इम्तियाज़-प्रीतम की जोड़ी ने पूर्व में जब वी मेट, रॉकस्टार ,तमाशा जैसा संगीत  रचा है। हाँ में ग़लत अच्छा गीत है पर वो इम्तियाज़ के टे्रड मार्क में,फि़ल्म के अंत में आता है,तब तक दर्शक की रुचि फि़ल्म से ख़त्म हो चुकी होती है। फि़ल्म के संवाद भी अनावश्यक रूप से दार्शनिकता लिये हुए और उबाऊ हैं।आरती बजाज की एडिटिंग भी अप्रभावी है। कुल मिला कर इम्तियाज़ की लव आजकल निराश करती है।फि़ल्म में सारा के एक संवाद की तजऱ् पर कहा जाए तो ये फि़ल्म आपको बहुत तंग करती है।