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संपादकीय :- बड़े संकट के संकेत
April 12, 2020 • संजय सक्सेना

देश के कई क्षेत्रों में कोरोना का संक्रमण तेज गति से बढऩे के कारण इक्कीस दिनों का लॉकडाउन और बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। हाल ही में मंत्रियां के समूह की बैठक हुई, उसके बाद प्रधानमंत्री ने सभी दलों के खास नेताओं से चर्चा भी की, सभी में यही संकेत मिल रहे हैं कि लाक डाउन की अवधि को और बढ़ाना होगा। परंतु इसके साथ ही सरकार की एक दुविधा यह भी बढ़ रही है कि लॉकडाउन के कारण सारी आर्थिक गतिविधियां ठप हैं, जिससे अंदर ही अंदर एक ऐसे संकट को मजबूती मिल रही है, जो आगे चलकर विस्फोटक रूप ले सकता है। 
एक फैक्टर यह है कि खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी लॉकडाउन को कोरोना से लडऩे का पर्याप्त उपाय नहीं माना है। लेकिन हमारे देश में तो अभी इसे सबसे बड़ा उपाय माना ही जा रहा है। प्रधानमंत्री पूर्व में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से इस मसले पर चर्चा कर चुके हैं जिसमें तय हुआ है कि जिला प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर लॉकडाउन हटाने का प्लान भेजा जाए। इस सप्ताह के आखिर तक सभी राज्य इस आशय वाली अपनी-अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजेंगे और उसके आधार पर केंद्र सरकार फैसला करेगी। अभी जैसा लग रहा है, पूरे देश से एक साथ लॉकडाउन खत्म नहीं किया जाएगा। सरकार की योजना है कि जिन जगहों पर कोरोना के केस ज्यादा पाए गए हैं वहां लॉकडाउन जारी रखा जाए। संक्रमण की मात्रा और पाजिटिव प्रकरणों की वृद्धि के आधार पर राज्यों को चार कैटिगरी में बांटा जाएगा और उसी हिसाब से अलग-अलग राज्यों या फिर जिलों में लॉकडाउन हटाने और विभिन्न सेवाएं शुरू करने के बारे में सोचा जाएगा। इनमें ज्यादा एक्टिव कोरोना वाले इलाकों में लॉकडाउन से कोई छूट नहीं दी जाएगी लेकिन जिन राज्यों में पिछले सात दिन से कोरोना का कोई भी मामला सामने नहीं आया हो, वहां राहत मिल सकती है। 
असल में 24 मार्च की आधी रात से पूरे देश में तीन हफ्ते के लिए लागू लॉकडाउन की अवधि 14 अप्रैल को समाप्त हो रही है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यों-ज्यों लॉकडाउन की अवधि बढ़ेगी, समाज के कमजोर वर्ग की मुश्किलें तो बढेंगी ही, निम्न मध्यम वर्ग का संकट भी बढ़ता चला जाएगा। अभी यह तबका किसी तरह जीवन यापन कर रहा है लेकिन वह कब तक इस तरह बैठा रहेगा? असंगठित और छोटे स्तर के धंधे पूरी तरह चौपट हो गए हैं। निर्माण कार्यों का चक्का एकदम रुका हुआ है। छोटे-मोटे खाने-पीने की दुकानें और तमाम तरह की सर्विसेज बंद हैं। फैक्ट्रियों के बंद होने से चिकित्सकीय सामग्री भी नहीं बन पा रही है। ऐसे में रास्ता यही बचता है कि चुनिंदा दायरों मे उत्पादन कार्य किसी तरह शुरू हो ताकि हम चिकित्सा उपकरण और खाद्य सामग्री बना सकें। इससे खाली बैठे श्रमिकों को काम मिलेगा, चिकित्साकर्मियों को जरूरी उपकरण मिल सकेंगे और लोगों की जांच का काम भी तेज होगा। 
सरकार भले ही कह रही है कि निजी क्षेत्र के मालिक बिना काम या घर बैठे काम कराने का वेतन कर्मचारियों को देंगे, लेकिन यह व्यवहार में नहीं हो पा रहा है। अभी से व्यावसायिक वर्ग ने तो अपील भी करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि वे अपने घर से कब तक पैसा लगाएंगे। पिछले पांच-छह सालों से अधिकांश व्यवसाय चौपट होते जा रहे हैं। जैसे-तैसे वे अपना व्यापार चालू रखे हुए हैं, अब उनका काम तो पूरी तरह बंद है, जिनकी बड़ी दुकानें या फैक्ट्रियां हैं, जो पूरी तरह बंद हैं, वो बिना काम 
के कैसे वेतन दे पाएंगे। उनके पास उस हिसाब से व्यवस्था भी नहीं है। अपनी जगह वो सही भी हैं। ये लोग सरकार से आर्थिक मदद या पैकेज भी मांग रहे हैं। दूसरी ओर सरकार की हालत भी पतली होती जा रही है। केवल मनरेगा और जनधन योजना या बीपीएल वालों की खातिरदारी में ही अर्थव्यवस्था डांवाडोल हो रही है, बाकी की क्या मदद हो पाएगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी, उम्मीद की जानी चाहिए कि लाक डाउन खुलने के बाद कुछ बेहतर माहौल बने और अर्थ व्यवस्था कुछ सुधार की ओर बढ़े।