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वैधानिक संकट में घिर सकती है शिवराज सरकार?  
August 22, 2020 • खिलावन चंद्राकर • मध्यप्रदेश

भोपाल।  मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार संवैधानिक संकट से घिर सकती है? ऐसा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि सरकार को 6 महीने की अंतराल से विधानसभा का सत्र बुलाना जरूरी है और यदि 23 सितंबर तक सत्र नहीं बुलाया जाता तो सरकार पर वैधानिक संकट के बादल घिर सकते हैं। पिछला विधानसभा सत्र शिवराज के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद 24 से 27 मार्च के लिए बुलाया गया था , जिसमें बहुमत साबित करने के बाद सरकार ने 10 मिनट की कार्यवाही चलने के बाद ही विधानसभा का सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी थी। इसके उपरांत 20 से 24 जुलाई को मानसून सत्र रखा गया था किंतु कोरोना संक्रमण काल को देखते हुए सर्वदलीय बैठक के निर्णय के बाद इसे भी निरस्त कर दिया था। अब सरकार के लिए 23 सितंबर या इससे पहले सत्र बुलाना जरूरी हो गया है। इस संदर्भ में ध्यान आकर्षित कराने हेतु विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक एनपी प्रजापति ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है ,साथ ही उन्होंने प्रोटेम स्पीकर के अधिकार एवं दायित्व को लेकर भी कानून एवं प्रक्रिया का हवाला दिया है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि शिवराज सरकार द्वारा कई ऐसे निर्णय लिए गए हैं जिसे विधेयक और जरूरी शासकीय कार्य की परिधि में लाकर विधानसभा मे पारित कराना आवश्यक है .इसी तरह अध्यादेश के द्वारा लाए गए बजट का विधानसभा में अनुमोदन भी जरूरी है। इसी बीच सदन में सवाल पूछने के अधिकार को लेकर कई नए और पुराने विधायकों में बेचैनी भी दिखाई दे रहा है, क्योंकि कोरोना के कारण निरस्त किए गए  पिछले सत्र में पूछे गए सारे सवाल को शुन्य कर दिया गया है। ऐसी दशा में देखना यह होगा की सरकार विधानसभा सत्र बुलाने के लिए अधिसूचना कब जारी करती है. यहां यह बताना भी जरूरी है कि पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों ने कोरोना काल के बावजूद सभी आवश्यक सावधानियां बरतें हुए विधानसभा का सत्र बुलाना सुनिश्चित कर लिया है।
डर्टी बंगला पॉलिटिक्स
 राजधानी भोपाल में इन दिनों डर्टी बंगला पॉलिटिक्स चल रहा है। सरकार कई पूर्व मंत्रियों से बंगला वापस लेने में जुटी हुई है। कई बार नोटिस के बाद संपदा विभाग ने प्रदेश के पूर्व मंत्री तरुण भनोट, विजयलक्ष्मी साधो और सज्जन सिंह वर्मा का बंगला खाली करा दिया है। इस बीच पूर्व मंत्री पीसी शर्मा को चार इमली स्थित सरकारी बंगला खाली करने की नोटिस पर हाईकोर्ट से स्थगन भी मिल गया है। ऐसे में कांग्रेस के अन्य पूर्व मंत्री हाल फिलहाल बंगला खाली कर देंगे ऐसा नहीं लग रहा है। वैसे भी आवास आवंटन का अधिकारक्षेत्र मुख्यमंत्री के पास सुरक्षित होता है इसके बावजूद बिना वैकल्पिक व्यवस्था के पूर्व मंत्रियों से उनका आवास खाली कराना समझ से परे है. इसे डर्टी पॉलिटिक्स का हिस्सा मान लिया जाए तो कोई गलत बात नहीं होगी। यहां यह बताना आवश्यक है कि पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने सवा साल के कार्यकाल में किसी भी पूर्व मंत्री को बंगला खाली कराने के लिए संपदा संचालनालय को फ्री हैंड नहीं किया. संभवत यही कारण है कि तात्कालिक रूप से भूतपूर्व हो चुके मंत्री भूपेंद्र सिंह, नरोत्तम मिश्रा, रामपाल सिंह, सुरेंद्र पटवा, विश्वास सारंग सहित स्व बाबूलाल गौर का बंगला भी खाली नहीं कराया गया। अब नए मंत्रियों के नाम बंगला आवंटित कर पुराने मंत्रियों को बंगला खाली करने का नोटिस लगातार दिया जा रहा है जबकि सरकार का कार्यकाल 5 माह ही हुए हैं और पूर्व मंत्रियों को विधायक के रुप में वैकल्पिक आवास भी प्रदान नहीं किया गया है।
तमगा छीना फिर भी खुशी
स्वच्छता सर्वेक्षण के ताजे परिणाम के बाद राजधानी भोपाल का देश के सबसे स्वच्छ राजधानी होने का तमगा छिन गया है फिर भी सरकार और नगर निगम के अधिकारी खुश है। यह खुशी इसलिए कि 2019 में देश में स्वच्छता के मामले में 19वें नंबर पर रहने वाले राजधानी भोपाल अब 7वें स्वच्छ शहर की रेटिंग प्राप्त किया है ,साथ ही बेस्ट सेल्फ संस्टेनेबल स्टेट कैपिटल का तमगा भी हासिल किया है। ऐसी दशा में अब आने वाले वर्ष में शहर के स्वच्छता कार्यक्रम को नए सिरे से गति देने की जरूरत है ताकि देश के सबसे स्वच्छ दूसरा शहर और सबसे स्वच्छ राजधानी जैसे मुकाम को फिर से हासिल किया जा सके। हालाकि इस बीच सबसे संतोषजनक बात यह भी है कि प्रदेश का सबसे बड़ा शहर इंदौर देश के सबसे स्वच्छ शहर होने की बादशाहत को चौथी बार भी कायम रखने में सफल हुआ है।
2 करोड़ युवा वोटर केंद्र पर
प्रदेश के 27 विधानसभा क्षेत्रों में होने जा रहे उपचुनाव को लेकर 2 करोड़ युवा वोटर केंद्र पर है। संभवत यही कारण है कि भाजपा की शिवराज सरकार इन्हें लुभाने के लिए नित नई घोषणाएं करने में लगी हैं। सरकारी नौकरी में प्रदेश के मूल निवासी होने की अनिवार्यता इसका एक बड़ा उदाहरण है। भले ही व्यापम मामले में युवाओं के अवसर छीनने और बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ने जैसे आरोप भाजपा सरकार के कार्यकाल पर है। वही कांग्रेसी भी इस तथ्य को जान चुकी है और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ युवा संवाद जैसे कार्यक्रम आयोजित कर ना सिर्फ युवा वोटरों को लुभाने का प्रयास कर रहे है बल्कि अपने 15 महीने के कार्यकाल में उनके उत्थान के लिए किए गए प्रयासों की दुहाई दे रही है। यह बात भी अलग है कि कमलनाथ सरकार ने बेरोजगारों को 4000 रुप्रति माह भत्ता देने और रोजगार के बेहतर अवसर निर्मित न करने की बड़ी चुक कर है।युवा वोटरों की संख्या बल को देखते हुए यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है की भले ही वे बेकारी का दंश झेल रहे हैं किंतु उनका रुख उपचुनाव में किसी भी दल के हार जीत का पैमाना तय करेगी।